संस्कृत भाषा मे चमत्कार
- क: खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोटौठीडढण: । तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोऽरिल्वाशिषां सह ।।
अर्थात्- पक्षियों का प्रेम , शुद्ध बुद्धि का दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत , शत्रु - संहारकों में अग्रणी , मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन ? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं ।
माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल "भ " और " र " , दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है -
- भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे । भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभाः ।।
अर्थात् धरा को भी वजन लगे ऐसे वजनदार , वाद्य यंत्र जैसी आवाज निकालने वाले और मेघ जैसे काले निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया ।
किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल "न" व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने कहा है -
- न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु ।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत् ।।
अर्थ- जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है । ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है । घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है ।
- विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः । विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः ॥
अर्थात् अर्जुन के असंख्य बाण सर्वत्र व्याप्त हो गए जिससे शंकर के बाण खण्डित कर दिए गए । इस प्रकार अर्जुन के रण कौशल को देखकर दानवों को मरने वाले शंकर के गैन आश्चर्य में पड़ गए । शंकर और तपस्वी अर्जुन के युद्ध को देखने के लिए शंकर के भक्त आकाश में आ पहुँचे ।
भगवन श्री कृष्णा की महिमा का गान करने वाला एक श्लोक जिसकी रचना भी एक ही अक्षर से की गयी है ।
- दाददो दुद्ददुद्दादी दाददो दूददीददोः ।
दुद्दादं दददे दुद्दे दादाददददोऽददः ॥
अर्थ - दादद (दान देने वाले), दुष्टों को उपताप देने वाले, दादाद (शुद्धि देने वाले) परिताप देने वाले दुष्टों के नाशक बाहु वाले और दाताओं तथा अदाताओं दोनों को देने वाले श्रीकृष्ण भगवान ने दुद्द (दुःखदायी-शत्रु) पर दुःखदायी बाण को दिया (शत्रुनाशक बाण को चलाया)।
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